प्रेम बन कर साँवरे तुम यूँ बरसते रहो ।
मन के मंदिर में सदा यूँ ही बसते रहो ॥
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तुम जो आये तो चेहरे में मुस्कान है
तुममें ही अटकी अब मेरी जान है
तुम अविरल बहते से अहसास हो
तुझ ही मेरे जीवन और स्वांस हो
तुम बिन अधुरी बस एक कहानी हूँ
मानो तो राधा या मीरा दिवानी हूँ ।
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प्रेम जो किया है तो अब तरसते रहो ।
प्रेम बन कर साँवरे तुम यूँ बरसते रहो ॥
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तुम जो मन तो मैं मन की डोर पिया
तुमने हीं तो जीवन को एक छोर दिया
मैं तो पिंजरे में बंद बेजान सी पडी थी
खुद से ही तो खुद मैं कई बार लडी थी
तुम ने ही तो इस "रूपा" को रूप दिया
अव्यवस्थित से शब्दों को स्वरूप दिया ।
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इन शब्दों में यूँही आकर तुम हँसते रहो ।
प्रेम बन कर साँवरे तुम यूँ बरसते रहो ॥
♡ ♥ ♡
॥ जय श्री राधे ॥
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