मेरे लरजते हुए होंठों पर, दाँतों की पाँत में,
उसने रोप दी अपनी इच्छाओं की गुनगुनाती पौध,
और मैं, अचानक पहुँच गयी किसी और ही बृहत् मात्र
आलौकिक विश्वालोकन में;
सोचती हूँ,
यही है 'प्रेम' और सार्वभौमिक, भावनात्मक ‘प्रेम’ की परिभाषा ॥
♡ ♥ ♡
॥ जय श्री राधे ॥
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